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साधु और साँप

यह कहानी हमें सिखाती है कि भगवान उन्हीं को मिलते हैं जो हर तरह की बुराई से लड़ते हैं।

Keywords: भगवान, शक्ति, संघर्ष

साधु और साँप

Story


एक बार की बात है एक गाँव में बहुत पुराना बरगद का पेड़ था। उस पेड़ के तने में एक बहुत ज़हरीला साँप रहता था। जब भी कोई पेड़ के पास से गुज़रता साँप उस पर हमला करने की कोशिश करता। 


एक दिन एक साधु गाँव की तरफ आ रहे थे। वह बड़ी दूर से पैदल चलकर आ रहे थे जिस कारण उन्हें बहुत थकान हो गई। साधु को वह पुराना बरगद का पेड़ नज़र आया। उन्होंने सोचा, “चलो थोड़ी देर इस पेड़ के नीचे आराम कर लेता हूँ।”


जैसे ही साधु पेड़ की तरफ आगे बढ़े उन्होंने देखा कि पेड़ के तने से एक साँप सरसराते हुए बाहर निकला और फन उठाए साधु की ओर बढ़ने लगा। साधु ने एक मंत्र कहा जिससे साँप शांत हो गया और उसने अपना फन नीचे कर लिया। 


साधु ने साँप से कहा, “तुम क्यों बिना वजह मासूम जानवरों और लोगों पर हमला करते हो। चलो मैं तुम्हें एक मंत्र बताता हूँ जिसका जाप करने से तुम्हारा मन शांत होगा और तुम खुद को भगवान के पास महसूस करोगे।” 


साधु ने साँप को वह मंत्र बताया और कहा, “इस मंत्र का रोज़ जाप करना और किसी को भी नुकसान मत पहुँचाना।” ऐसा कहकर साधु वहाँ से चले गए। 


कुछ दिन बीते, गाँववालों ने ध्यान दिया कि साँप अब किसी को भी डस नहीं रहा है। एक दिन गाँव के कुछ बच्चे खेलते-खेलते बरगद के पेड़ के पास आ गए। साँप मंत्र जाप कर रहा था वो सब साँप को परेशान करने लगे। बच्चों ने साँप पर चीज़ें फेंकी और उसे पैरों से मारा। पर साँप शांत रहा।


बच्चों ने उसे पूँछ से उठाकर गोल-गोल घुमाया और ज़मीन पर पटक दिया। साँप को बहुत चोट लगी और वह दर्द के कारण हिल भी नहीं पा रहा था। इतना कुछ होने के बाद भी साँप ने अपने बचाव में कुछ नहीं किया। वह बड़ी मुश्किल से रेंगते हुए अपने बिल तक पहुँचा। 


साँप कई दिनों तक बिना कुछ खाए-पिए अपने बिल में पड़ा रहा। उसने शिकार करना भी छोड़ दिया था। वह पेड़ से गिरे हुए पत्ते और फल खा कर जीवित रहा।


साँप को ऐसा जीवन जीते हुए काफी समय बीत गया। तभी एक दिन फिर साधु गाँव में आए। वह साँप से मिलने गए। साँप बिल से बाहर आया और उसने साधु को प्रणाम किया। साधु को साँप बहुत कमज़ोर लगा।


साधु ने साँप से पूछा कि वह शरीर से इतना कमज़ोर कैसे हो गया। साँप ने कहा, “आपकी बात मानकर अब मैंने दूसरों को नुकसान पहुँचाना बंद कर दिया है। मैं पत्ते और फल खाकर जीवित हूँ।”


साधु बोले, “केवल भोजन की कमी से तुम्हारी यह हालत नहीं हो सकती। क्या कोई और कारण है?” साधु के ऐसा पूछने पर साँप ने कहा, “जब मैंने दूसरों को डसना बंद कर दिया तो गाँव के कुछ बच्चों ने मुझे बहुत परेशान किया। उन्होंने मुझे उछाल कर इधर-उधर फेंका जिस कारण मुझे बहुत चोट लगी और मेरी यह हालत हो गई। पर इतना कुछ होने के बाद भी मैं आपके दिखाए हुए रास्ते पर चला और किसी पर पलट कर हमला नहीं किया।” 


साधु साँप की बात सुनकर हैरान रह गए। वह साँप से बोले, “तुम कितने मूर्ख हो। मैंने तुम्हें किसी को डसने या काटने से मना किया था। पर तुम फुफकार कर उन बच्चों को डरा सकते थे और खुद को बचा सकते थे।”


साधु ने साँप को समझाया कि भगवान को पाने का केवल यह तरीका नहीं है कि हम किसी के साथ गलत न करें बल्कि यह भी उतना ही ज़रूरी है कि हम अपने साथ गलत न होने दें। भगवान उन्हीं को मिलते हैं जो हर तरह की बुराई से लड़ते हैं।

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