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यह कहानी हमें सिखाती है कि हमें अपने ज्ञान का घमंड नहीं करना चाहिए और ज्ञानी व्यक्ति का सम्मान करना चाहिए।

Keywords: सच, भगवान, प्रश्न

गार्गी

Story


ऋषि वचक्नु की बेटी गार्गी को छोटी उम्र से ही वेद और उपनिषदों के ज्ञान में बहुत रुचि थी। उन्होंने कम उम्र में ही चारों वेदों का ज्ञान पा लिया था। वह बहुत होशियार थी। जैसे-जैसे वो बड़ी हुई वेद के दर्शन पर उनकी समझ बढ़ती गई।


वह ज्ञानी ऋषियों के साथ वेद के दर्शन पर चर्चा करती थी और सबको ज्ञान की बातें बताती थी। इस कारण उन्हें ब्रह्मवादिनी कहा जाने लगा। गार्गी मिथिला के राजा जनक के दरबार के नवरत्नों में से एक थी। 


एक बार राजा जनक के दरबार में ऋषियों की सभा लगी। उस सभा में दूर-दूर से बहुत ही महान और ज्ञानी ऋषि पहुँचे। उन ऋषियों में एक बड़े ही महान ऋषि थे - ऋषि याज्ञवल्क्य।


सभी ऋषि उनसे वेद के विषय पर गहरे प्रश्न कर रहे थे जिसका वह सही-सही उत्तर दे रहे थे। गार्गी ने ऋषि याज्ञवल्क्य को चुनौती देते हुए कहा, “मैं आपसे दो प्रश्न पूछूँगी, अगर आपने उन प्रश्नों के सही उत्तर दे दिए तो आप ही सभा के विजेता माने जाएँगे।” 


याज्ञवल्क्य ने गार्गी की बात मान ली और उन्हें प्रश्न पूछने के लिए कहा। गार्गी ने अपना पहला प्रश्न पूछा, “वह क्या है जो स्वर्ग से ऊपर है और पृथ्वी से नीचे है, जो स्वर्ग और पृथ्वी के बीच भी है। जो पहले था, अभी है, और हमेशा रहेगा। और वह किससे मिला हुआ है।” 


याज्ञवल्क्य ने जवाब दिया, “वह आकाश है।” 


गार्गी ने अपना दूसरा प्रश्न पूछा, “आकाश किससे बना है?”


याज्ञवल्क्य ने जवाब दिया, “आकाश उस सच से बना है, जो न बड़ा है न छोटा, जो न गरम है न ठंडा, जो न रोशनी है न अँधेरा। उसमें न स्वाद है न गंध, न उसके कान हैं न नाक है, न मुँह है, न मन है। न ही उसमें प्राण है न कोई ऊर्जा है। उसे नापा नहीं जा सकता। न उसके अंदर कुछ है न उसके बाहर कुछ है।उसी सच की वजह से सूरज और चाँद अपनी जगह पर हैं, धरती और आकाश अपनी जगह पर हैं। उसी सच की वजह से दिन और रात होते हैं, महीने और मौसम बदलते हैं। उसी सच के वजह से नदियाँ बहती हैं। इस सच को जाने बिना, हज़ारो साल तक तपस्या कर के भी कोई कुछ नहीं पा सकता। जो इस सच को जान लेता है वो ज्ञानी हो जाता है। इस सच को देखा नहीं जा सकता पर देखने वाला वही है, उसे सुना नहीं जा सकता पर सुनने वाला वही है। आकाश भी इसी से बना है।” 


याज्ञवल्क्य का जवाब सुनकर गार्गी बहुत संतुष्ट हुई। गार्गी और सभी ब्राह्मणों ने उन्हें नमस्कार किया और उन्हें विजेता माना।  


गार्गी के जीवन से हमें यह सीख मिलती है कि हमे अपने ज्ञान का घमंड नहीं करना चाहिए और अपने से ज़्यादा ज्ञानी व्यक्ति का सम्मान करना चाहिए।   


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स्रोत: बृहदारण्यक उपनिषद्

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Story type: Motivational

Age: 7+years; Class: 3+

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