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कृष्ण ने दिखाया अपना विश्वरूप
यह कहानी हमें सिखाती है कि विश्वास, साहस और बुद्धि से हम सच तक पहुँच सकते हैं।

कहानी
बहुत समय पहले, कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि पर दो विशाल सेनाएँ युद्ध की तैयारी कर रही थीं। उनके बीच खड़े थे अर्जुन—एक महान योद्धा और राजकुमार। उनके सारथी और मार्गदर्शक थे भगवान श्रीकृष्ण।
जब अर्जुन ने शत्रु सेना की ओर देखा। वहाँ उनके अपने ही रिश्तेदार, गुरु और मित्र खड़े थे। उनका हृदय भारी हो गया। उन्होंने कहा, “कृष्ण, मैं अपने ही प्रियजनों से कैसे युद्ध करूँ? मैं किसी को चोट नहीं पहुँचाना चाहता।”
कृष्ण मुस्कुराए और धीरे से बोले, “अर्जुन, तुम केवल यह शरीर नहीं हो—तुम आत्मा हो। शरीर नष्ट होता है, लेकिन आत्मा अमर है।”
कृष्ण ने अर्जुन को उनके सच्चे स्वरुप और जीवन के सत्य के बारे में समझाया। उन्होंने अर्जुन के सारे भ्रम दूर किए और उन्हें अपना धर्म निभाने और सत्य के साथ खड़े होने की सीख दी।

अर्जुन ध्यान से सुनते रहे। फिर बोले, “हे कृष्ण, मैं आपके बात पर विश्वास करता हूँ। आप जो कह रहे हैं बिलकुल सही है। साथ ही मैं यह भी समझ गया हूँ कि आप कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं। मैं आपका सच्चा, दिव्य रूप देखना चाहता हूँ—वह रूप जिसमें पूरा ब्रह्मांड समाया है!”
कृष्ण ने कहा, “तुम अपने सामान्य नेत्रों से उसे नहीं देख सकते। मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि देता हूँ। तैयार हो जाओ, अर्जुन।”
और फिर —कुछ अद्भुत हुआ।
अर्जुन के सामने कृष्ण ने अपना विश्वरूप प्रकट किया—अपना विराट, ब्रह्मांडीय स्वरूप।
अर्जुन ने असंख्य मुख, नेत्र, हाँथ और पैर देखे। उन्होंने सूर्य और चंद्रमा को कृष्ण की आँखों के रूप में देखा, और अग्नि को उनके मुख के रूप में। उन्होंने पर्वत, नदियाँ, तारे, देवता और मनुष्य—सभी को कृष्ण के शरीर में देखा। मानो पूरा ब्रह्मांड एक ही स्थान पर समा गया हो!
जहाँ भी उन्होंने देखा, वहाँ प्रकाश, शक्ति और महानता थी—हजार सूर्यों से भी अधिक तेजस्वी!
अर्जुन कृष्ण का विश्वरूप देख कर हैरान रह गए, उन्होंने हाथ जोड़ लिए। बोले, “कृष्ण, आप ही शुरुआत हैं, आप ही मध्य हैं और आप ही अंत हैं। आप ही धर्म के रक्षक हैं।”
कृष्ण ने कहा, “हाँ, मैं धर्म की रक्षा और अधर्म के विनाश के लिए आया हूँ। जो लोग बुराई के मार्ग पर चले हैं, मैं उन्हें दंड दूँगा। पर जो मेरे भक्त हैं, जो दयालु, निडर और प्रेम से भरे हैं—वे सदा मुझ तक पहुँचते हैं।”
अर्जुन ने हृदय से कृष्ण को प्रणाम किया। बोले, “अब मैं समझ गया। मैं पूरे मन से आपके दिखाए मार्ग पर चलूँगा।”
उस क्षण के बाद अर्जुन के मन से भय समाप्त हो गया। कृष्ण के साथ होकर वे सत्य और धर्म की रक्षा के लिए युद्ध करने को तैयार हो गए।
जब भी हमें जीवन में डर या भ्रम हो, तब हमें भगवान की शरण में जाना चाहिए। वे हमें सही ज्ञान देकर सही मार्ग दिखाते हैं।
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श्लोक
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् |
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि ||
स्रोत: भगवद् गीता
अर्थ
अर्जुन, इस समस्त ब्रह्मांड को—चल और अचल सभी वस्तुओं सहित—मेरे इस विश्वरूप में एक साथ देखो। जो कुछ तुम देखना चाहते हो, वह सब इस विश्वरूप में ही देख लो।
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Story Type: Motivational
Age: 7+years; Class: 3+






















