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कृष्ण ने क्या खाया? प्रेम और भक्ति की कहानी

यह कहानी हमें सिखाती है कि भगवान उपहारों से ज़्यादा प्रेम और भक्ति को महत्व देते हैं।

Krishna ne kya khaya?

कहानी


एक बार भगवान कृष्ण शांति दूत बनकर हस्तिनापुर गए। पांडवों और कौरवों के बीच युद्ध होने वाला था, और कृष्ण युद्ध को रोकना चाहते थे। वे दोनों परिवारों के बीच शांति और न्याय लाना चाहते थे।


जब वे हस्तिनापुर पहुँचे, तो कौरवों के राजकुमार दुर्योधन ने उन्हें अपने राजमहल में ठहरने का निमंत्रण दिया। पर कृष्ण ने उसका निमंत्रण स्वीकार नहीं किया, वह बोले, “मैं जनता हूँ कि तुम्हारे मन में मेरे लिए प्रेम या सम्मान नहीं है, तुम मेरा स्वागत केवल इसलिए करना चाहते हो ताकि मैं युद्ध में तुम्हारा साथ दूँ। वैसे भी मैं यहाँ दोनों परिवारों के बीच सुलह करवाने के लिए आया हूँ, तुम्हारे धन और महल का आनंद लेने के लिए नहीं।”

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यह कहकर कृष्ण विदुर के घर की ओर चल पड़े। विदुर एक बुद्धिमान और नेक व्यक्ति थे, जो हमेशा सत्य का साथ देते थे। वे भगवान कृष्ण के सच्चे भक्त भी थे।


जब कृष्ण उनके घर पहुँचे, तब विदुर घर पर नहीं थे। उनकी पत्नी, विदुरानी ने जैसे ही भगवान कृष्ण को देखा, वह बहुत खुश हो उठीं। उन्होंने बड़े प्रेम से उनका स्वागत किया।


आनंद में डूबी हुई विदुरानी रसोई में गईं और केले लाकर भगवान को परोसने लगीं। लेकिन वह प्रेम और भक्ति में इतनी खो गई थीं कि फल फेंकती जा रही थीं और भगवान को केवल केले के छिलके ही खाने के लिए दे रही थीं!


कृष्ण मुस्कुराए और प्रेमपूर्वक उन छिलकों को खाने लगे। वह प्रेम इतना सच्चा था कि वह केले के छिलके भी उन्हें पकवानों से अधिक स्वादिष्ट लगे।


जैसे ही विदुर को पता चला कि श्रीकृष्ण उनके घर पर आए हुए हैं, वे दौड़े-दौड़े घर पहुँचे। जब उन्होंने देखा कि उनकी पत्नी श्रीकृष्ण को केले के छिलके खिला रही हैं, तो वह हैरान रह गए!


उन्होंने धीरे से विदुरानी को रोका। जब विदुरानी को अपनी गलती का पता चला तो वह बहुत शर्मिंदा हुईं। फिर उन्होंने प्रेम से एक केला छीला और इस बार फल भगवान कृष्ण को खाने के लिए दिया।


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कृष्ण मुस्कुराए और बोले, “विदुरानी, जो छिलके तुमने पहले दिए थे, वे अधिक मीठे थे। उनमें सच्चा प्रेम और पूर्ण ध्यान था।”

उस दिन सभी ने एक सुंदर बात सीखी — कि भगवान के लिए प्रेम और भक्ति ही सबसे मूल्यवान उपहार हैं, महँगी चीज़ें नहीं।

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श्लोक 


पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। 

तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मन:॥ 


स्रोत: भगवद् गीता


अर्थ 

यदि कोई मुझे (भगवान) प्रेम और भक्ति से पत्ता, फूल, फल या पानी अर्पित करता है, तो मैं उसे खुशी-खुशी स्वीकार करता हूँ। भगवान को बड़े उपहार नहीं चाहिए—उन्हें केवल हमारा प्रेम और श्रद्धा चाहिए।

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Story type: Spiritual

Age: 7+years; Class: 3+

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