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सही चुनाव: महाभारत की एक कहानी

यह कहानी हमें सिखाती है कि विनम्रता और बुद्धिमानी से सही चुनाव होते हैं।

Sahi-Chunav-Mahabharat ki ek Kahani

कहानी बहुत समय पहले पाँच वीर भाई थे, जिन्हें पांडव कहा जाता था। वे हमेशा धर्म की राह पर चलते थे और अपने सारे कर्तव्य ईमानदारी से पूरे करते थे। लेकिन एक दिन, उनके चचेरे भाई कौरवों ने छल करके उनसे उनका राज्य, इंद्रप्रस्थ छीन लिया। पांडवों को 13 वर्षों के लिए वनवास दिया गया। वे 12 वर्ष वन में रहे और 1 वर्ष, एक राज्य में अपनी पहचान छुपा कर रहे।


समय पूरा होने के बाद पांडव अपने राज्य को वापस लेने आए। परंतु कौरवों के बड़े भाई दुर्योधन ने गर्व से कहा, “मैं सुई की नोक जितनी भूमि भी नहीं दूँगा!” अब पांडवों और कौरवों के बीच एक बड़ा युद्ध होना तय था।


युद्ध की तैयारी के लिए दोनों पक्षों को अलग-अलग राजाओं से सहायता चाहिए थी। अर्जुन, जो पांडवों में सबसे महान धनुर्धर था, और दुर्योधन ने भगवान श्रीकृष्ण से सहायता लेने का सोचा। क्योंकि श्रीकृष्ण सबसे बुद्धिमान और शक्तिशाली थे।


दोनों श्रीकृष्ण के शहर द्वारका पहुँचे। दुर्योधन पहले पहुँचा और श्रीकृष्ण के सिर के पास आकर बैठ गया। वह अपने घमंड के कारण उनके चरणों के पास नहीं बैठा।


थोड़ी देर बाद अर्जुन पहुँचा। वह चुपचाप श्रीकृष्ण के चरणों के पास खड़ा हो गया और हाथ जोड़कर उनके जागने की प्रतीक्षा करने लगा। जब श्रीकृष्ण ने आँखें खोलीं, तो उन्होंने सबसे पहले अर्जुन को देखा, जो विनम्रता से उनके सामने खड़ा था।


अभी अर्जुन कुछ कह पाता, उससे पहले ही दुर्योधन बोला, “मैं पहले आया हूँ, इसलिए पहले मुझे चुनने का अधिकार है!”


श्रीकृष्ण मुस्कुराए और बोले, “सही कहा, पर मैंने सबसे पहले अर्जुन को देखा, इसलिए पहले चुनाव का अधिकार अर्जुन को मिलेगा।”


फिर श्रीकृष्ण ने दोनों को दो विकल्प दिए—

  1. उनकी नारायणी सेना, जो शक्तिशाली और वीर योद्धाओं से भरी थी।

  2. स्वयं श्रीकृष्ण, पर वे न तो युद्ध करेंगे और न ही कोई अस्त्र उठाएँगे।


अर्जुन ने तुरंत कहा, “मैं आपको चुनता हूँ, श्रीकृष्ण!”


दुर्योधन हँस पड़ा, “मूर्ख अर्जुन! मैं तो सेना को ही चुनुँगा।”


दुर्योधन के चले जाने के बाद श्रीकृष्ण ने अर्जुन से पूछा, “जब मैं युद्ध ही नहीं करूँगा, तो तुमने मुझे चुना क्यों?”


अर्जुन ने विनम्रता से कहा, “आपकी उपस्थिति ही मेरे सबसे बड़ी शक्ति है, प्रभु। कृपया मेरे सारथी बनिए और मुझे मार्ग दिखाइए।”


श्रीकृष्ण मुस्कुराए और सहमत हो गए। युद्ध में उन्होंने अर्जुन का मार्गदर्शन किया, और अपनी बुद्धि से पांडवों को विजय दिलाई।


उस दिन से श्रीकृष्ण को पार्थसारथी कहा जाने लगा — अर्थात् अर्जुन (पार्थ) के सारथी।


अर्जुन ने वह नहीं चुना जो शक्तिशाली था, बल्कि वह चुना जो सही था।


उसकी विनम्रता और भक्ति ने ही उसे सच्ची विजय दिलाई। वहीं दुर्योधन, जो अहंकार और अभिमान से भरा था, गलत चुनाव कर बैठा और अंत में उसे हार का सामना करना पड़ा।

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श्लोक 


यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥


स्त्रोत : भगवद् गीता


अर्थ 

सच्चे ज्ञान की कमी व्यक्ति को सही निर्णय लेने से रोकती है।

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Story Type: Motivational

Age: 7+years; Class: 3+

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