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अर्जुन और चिड़िया की आँख – एकाग्रता की शक्ति
यह कहानी हमें सिखाती है कि सफलता पाने के लिए प्रतिभा के साथ-साथ एकाग्रता और अनुशासन भी ज़रूरी है।

कहानी
आठ साल का रवि एक होशियार लड़का था जिसे किताबें पढ़ना और पहेलियाँ सुलझाना बहुत पसंद था। वह हर चीज़ के बारे में जानना चाहता था—जैसे हवाई जहाज़ कैसे उड़ते हैं और तारे क्यों चमकते हैं। लेकिन समझदार होने के बावजूद,उसकी पढ़ाई में बहुत अच्छे अंक नहीं आते थे।
उसके शिक्षक देखते थे कि रवि किसी काम को बड़े उत्साह से शुरू करता, लेकिन जल्दी ही किसी आवाज़, या किसी की बातचीत के कारण उसका ध्यान भटक जाता। और कभी-कभी पढ़ते समय वह अपनी ही किसी कल्पना में खो जाता।
एक दिन उसकी विज्ञान की शिक्षिका ने प्यार से कहा, “रवि, तुम्हारे पास प्रतिभा है, लेकिन तुममें एक चीज़ की कमी है—एकाग्रता।”
उस शाम जब रवि स्कूल से लौटा, तो चुपचाप खिड़की के पास बैठ गया। वह कुछ सोच में डूबा हुआ था।
दादाजी ने देखा कि रवि कुछ परेशान है। उन्होंने पास बैठकर पूछा, “क्या हुआ रवि?”
रवि ने सब कुछ दादाजी को बता दिया।
दादाजी मुस्कुराए और बोले, “आज मैं तुम्हें महाभारत की एक कहानी सुनाता हूँ—एक महान धनुर्धर अर्जुन की!”
गुरु द्रोणा चार्य से पांडवों और करवों को धनुर्विद्या सीखाते थे। एक दिन गुरु ने अपने शिष्यों की परीक्षा लेने का निश्चय किया।
उन्होंने एक पेड़ की डाली पर लकड़ी की चिड़िया टांगी और कहा, “तुम सब बारी-बारी से इस चिड़िया की आँख पर निशाना लगाओ।”
पहला छात्र आया। द्रोणाचार्य ने पूछा, “तुम्हें क्या दिखाई दे रहा है?” उसने कहा, “मुझे पेड़, चिड़िया और आकाश दिखाई दे रहा है।”
गुरु ने कहा, “पीछे हट जाओ।”
दूसरा छात्र आया और बो ला, “मैं डाली, चिड़िया और उसके पंख देख रहा हूँ।” गुरु ने सिर हिलाया और उसे भी पीछे भेज दिया। गुरु द्रोणाचार्य ने एक-एक कर सभी शिष्यों को निशाना लगाने से मना कर दिया।
अब अर्जुन की बारी थी। गुरु ने पूछा, “अर्जुन, तुम्हें क्या दिखाई दे रहा है?” अर्जुन ने उत्तर दिया, “गुरुदेव, मुझे केवल चिड़िया की आँख दिख रही है।”
गुरु ने फिर पूछा, “क्या तुम्हें पेड़ या उसकी डाली नहीं दिख रही?” अर्जुन बोला, “नहीं गुरुदेव, मुझे केवल आँख दिख रही है।”
गुरु द्रोणाचार्य प्रसन्न हो गए और बोले, “अब तीर चलाओ।” अर्जुन ने तीर छोड़ा, और वह सीधा चिड़िया की आँख में जा लगा।
कहानी सुनकर रवि के चारे पर मुस्कान आ गई। उसने कहा, “वाह! अर्जुन का किसी भी चीज़ से ध्यान नहीं भटका।”
दादाजी मुस्कुराए और बोले, “बिलकुल सही। प्रतिभा एक तीर की तरह है, लेकिन एकाग्रता उस धनुष की तरह है जो उसे दिशा और शक्ति देती है।”

उस दिन से रवि ने ठान लिया कि वह भी अर्जुन की तरह अपने मन को साधेगा। उसने ध्यान लगाना शुरू किया ताकि पढ़ाई के समय उसका मन इधर-उधर न जाए। उसने छोटे-छोटे लक्ष्य बनाए और उन्हें पूरी तरह एकाग्र होकर करने की कोशिश की।
धीरे-धीरे उसके अंक सुधरने लगे और आत्मविश्वास भी बढ़ने लगा।
अगर हम भी अर्जुन की तरह केवल अपने “लक्ष्य” पर ध्यान लगाएँ—तो हम कुछ भी हासिल कर सकते हैं।
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श्लोक
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जित: ।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्ते तात्मैव शत्रुवत् ।।
स्रोत: भगवद् गीता
अर्थ :
यदि तुम अपने मन पर नियंत्रण करना सीख लो, तो मन तुम्हारा सबसे अच्छा मित्र बन जाता है। लेकिन यदि तुम ऐसा नहीं कर पाते, तो यही मन तुम्हारा सबसे बड़ा शत्रु बन सकता है।
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Story Type: Motivational
Age: 7+years; Class: 3+






















