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वासुकी: शिवजी का परम भक्त

यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्चे प्रेम का मतलब है खुद से पहले दूसरों के बारे में सोचना।

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कहानी


एक चुलबुली और जिज्ञासु लड़की, सिमरन, अपनी गर्मियों की छुट्टियों का आनंद ले रही थी। वह अपनी माँ के बार-बार जगाने पर भी देर से उठती थी।


एक दिन, उसकी माँ ने उसे सुबह जल्दी उठा दिया ताकि वह सुबह की पूजा में शामिल हो सके। सिमरन ने अपनी दादी को पूजा करते हुए देखा। उसने पूछा, "दादी, आप किसकी पूजा कर रही हैं?"


दादी ने कहा, "मैं भगवान शिव की पूजा कर रही हूँ।"


सिमरन मुस्कुराई और बोली, "आप तो शिव जी की एक बड़ी भक्त हैं।"


"नहीं," दादी ने कहा, "वासुकी शिवजी का सबसे बड़ा भक्त है।"


सिमरन ने पूछा, "वासुकी कौन है?"


दादी ने कहा, "मैं तुम्हें वासुकी और उसकी शिव-भक्ति के बारे में सब कुछ बताऊँगी। फिर तुम समझोगी कि वह कितना बड़ा भक्त था।"


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दादी ने अपनी कहानी शुरू की।


बहुत समय पहले, ऋषि कश्यप और कद्रु का एक पुत्र हुआ, जिसका नाम वासुकी था। वासुकी एक बुद्धिमान और दयालु नाग था। उसके भाई-बहनों में शेषनाग थे, जो भगवान विष्णु की शैया बने, और मनसा देवी थीं, जो नागों की देवी थीं। वासुकी नागों का राजा था। वह भगवान शिव से बहुत प्रेम करता था। उसे शिव जी का शांत स्वभाव और उनका अद्भुत नृत्य बहुत पसंद था। वह हमेशा शिव जी के पास रहना चाहता था।


इसलिए वह रोज भगवान शिव की पूजा करता था। एक दिन उसने कहा, "प्रिये शिव जी, मैं हमेशा आपके पास रहना चाहता हूँ। क्या मैं आपके साथ रह सकता हूँ?"


भगवान शिव मुस्कुराए और बोले, "बिल्कुल, वासुकी। तुम मेरी गर्दन के चारों ओर लिपटकर हमेशा

मेरे साथ रह सकते हो।"


उस दिन से, वासुकी भगवान शिव की गर्दन के चारों ओर हार की तरह लिपट गया। वह बहुत खुश था क्योंकि अब वह अपने प्रिय भगवान के पास रह सकता था।


फिर एक दिन, देवताओं और राक्षसों ने समुद्र मंथन करने का सोचा ताकि अमृत, जो अमरता का रस है, प्राप्त किया जा सके। उन्हें समुद्र मंथन के लिए एक मजबूत रस्सी की जरूरत थी, इसलिए उन्होंने वासुकी से मदद माँगी।


वासुकी ने तुरंत सहमति दी क्योंकि वह भगवान शिव की सेवा करना चाहता था। वह समुंद्र मंथन में मदद करके शिवजी के प्रति अपनी भक्ति और प्यार को साबित करना चाहता था। यह मंथन पूरे संसार के लिए लाभकारी था।


वासुकी ने मंथन की रस्सी बनने का निर्णय लिया। मंदराचल पर्वत को मंथन की मथानी बनाया गया, और वासुकी ने खुद को मंदराचल पर्वत के चारों ओर लपेट लिया।


देवता एक तरफ से रस्सी खींचते और राक्षस दूसरी तरफ से। यह काम बहुत कठिन था। वासुकी को बहुत दर्द हुआ, लेकिन उसने हार नहीं मानी।



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मंथन के दौरान, जब देवता और राक्षस वासुकी को खींच रहे थे, तो उसे बहुत तेज दर्द हुआ। वह खुद को संभाल नहीं पाया और उसने उल्टी कर दी। उसकी उल्टी से एक भयंकर विष, जिसे हलाहल कहा गया, समुद्र में गिर गया। यह विष इतना खतरनाक था कि इससे पूरी दुनिया को नुकसान हो सकता था।


सब लोग डर गए और भगवान शिव के पास भागे।


भगवान शिव ने करुणा दिखाते हुए निडर होकर वह विष पी लिया ताकि सबकी रक्षा हो सके। वासुकी को दुख हुआ कि उसके प्रिय भगवान को विष पीना पड़ा, लेकिन साथ ही उसे गर्व भी हुआ कि वह भगवान शिव की मदद से दुनिया को बचाने में काम आ सका।


"दादी," सिमरन ने पूछा, "भगवान शिव ने वासुकी को अपनी गर्दन पर रखने की मंजूरी क्यों दी? क्या उन्हें डर नहीं लगा?"


दादी मुस्कुराईं और बोलीं, "भगवान शिव ने वासुकी का प्यार भरा दिल और गहरी भक्ति देखी। शिवजी निडर और दयालु हैं, इसलिए उन्हें वासुकी से डर नहीं लगा।बल्कि उन्होंने वासुकी को एक सच्चे दोस्त के रूप में अपनाया और उसे अपने दिव्य रूप का हिस्सा बना लिया। शिवजी अपनी शक्ति, शांत स्वभाव और ज्ञान के कारण सभी को नियंत्रित कर सकते हैं, चाहे वे कोमल हों या प्रचंड।"


वासुकी का निःस्वार्थ भाव और साहस हमें सिखाता है कि हमें अच्छा और बहादुर बनना चाहिए। जब हम मिलकर काम करते हैं और एक-दूसरे की मदद करते हैं, तो हम किसी भी समस्या को हल कर सकते हैं!


सिमरन खुश हो गई। उसने अपनी दादी को जोर से गले लगाया और अंदर चली गई। उसने अपनी माँ से कहा कि वह हर दिन जल्दी उठेगी, अगर दादी उसे हर सुबह एक नई कहानी सुनाए।

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श्लोक:


यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥

Yajnadana-tapah-karma na tyajyam karyam eva tat
Yajno danam tapash caiva pavanani manishinam


स्रोत: भगवद्गीता, अध्याय 18, श्लोक 5


अर्थ:

यज्ञ (निःस्वार्थ कर्म), दान (दूसरों की मदद) और तप (आत्म-संयम) जैसे कार्यों को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। ये कार्य हमारे मन और हृदय को शुद्ध करते हैं और हमें एक अच्छा इंसान बनाते हैं।

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Story type: Motivational

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