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परशुराम और उनकी कुल्हाड़ी

यह कहानी हमें सिखाती है कि हम साहस, ढृढ़ता और धर्म के साथ किसी भी चुनौती का सामना कर सकते हैं।

परशुराम और उनकी कुल्हाड़ी

कहानी

 

केरल में एक छोटे से मंदिर में लोग परशुराम जयंती, जिसे अक्षय तृतीया भी कहते हैं, मनाने के लिए इकट्ठा हुए थे।मंदिर के पुजारी सभी को भगवान परशुराम की कहानियाँ और उनसे जुड़ी उनकी शिक्षाएँ भी दे रहे थे। मंदिर में कुछ छोटे-छोटे बच्चे, आगे बैठकर ध्यान से उनकी बातें ध्यान से सुन रहे थे।


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पुजारी ने आगे बताया कि भगवान परशुराम अमर हैं और वे भगवान विष्णु के छठे अवतार हैं।उनका जन्म ऋषि जमदग्नि और राजकुमारी रेणुका के घर हुआ था।


जन्म के समय उनका नाम भार्गव राम था। राम कोई साधारण बालक नहीं थे। वे बहादुर, और दयालु और उन्हें अपने पिता से ज्ञान प्राप्त करना बहुत पसंद था। साथ ही, वे भगवान शिव के परम भक्त भी थे।


एक दिन, राम ने पूरे मन से भगवान शिव की आराधना की।उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और बोले, "प्यारे राम, तुम क्या चाहते हो?"


राम ने झुककर कहा, "हे शिव, मैं धर्म की रक्षा और निर्दोष लोगों की मदद करना चाहता हूँ कृपया मेरा मार्गदर्शन करें और अपनी शक्ति प्रदान करें।"


भगवान शिव परशुराम के गुरु बन गए और उन्हें महान योद्धा बनने की शिक्षा दी।परशुराम की अद्भुत क्षमता देखकर भगवान शिव ने उन्हें सभी तरह की शस्त्र विद्या में निपुणता, 'कलारीपयट्टू' का वरदान दिया।


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भगवान शिव ने राम को एक शक्तिशाली कुल्हाड़ी भी दी। यह कोई साधारण कुल्हाड़ी नहीं थी; इसमें दिव्य शक्तियाँ थीं ।


भगवान शिव ने राम को आशीर्वाद दिया और कहा, "अब तुम परशुराम हो, जो कुल्हाड़ी यानी परशु धारण करता है।इसका उपयोग समझदारी से करना, केवल बुराई से लड़ने और कमजोरों की रक्षा के लिए।"


एक कहानी में बताया जाता है कि बहुत समय पहले, भारत के पश्चिमी तट पर बड़ी-बड़ी लहरें और तूफान आए, जिससे ज़मीन पानी में डूब गई। परशुराम ने समुद्र देवता वरुण से ज़मीन वापस देने के लिए कहा। उनकी लड़ाई के दौरान, परशुराम ने अपनी दिव्य कुल्हाड़ी समुद्र में फेंकी। इससे ज़मीन का एक बड़ा हिस्सा ऊपर आ गया, लेकिन वरुणदेव ने चेतावनी दी कि यह भूमि खारी मिट्टी के कारण बंजर है।


परशुराम ने नागराज, सर्पों के राजा, से प्रार्थना की कि वह इस भूमि को शुद्ध करें। नागराज ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की, और उनके सर्पों ने अपने विष से खारापन खत्म कर दिया। इससे वह भूमि फिर से हरी-भरी और उपजाऊ हो गई।


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परशुराम ने अपनी ताकत का प्रयोग कभी अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों की मदद के लिए किया। उनकी कुल्हाड़ी उनकी बहादुरी और न्याय के प्रति समर्पण का प्रतीक बन गई। उन्होंने इसका इस्तेमाल बुराई और अन्याय  करने वाले शासकों को सज़ा देने के लिए किया, जो निर्दोष लोगों को परेशान करते थे।


कहते हैं कि बहुत समय पहले, कई राजा और योद्धा थे जिनका काम लोगों की रक्षा करना और धर्म का पालन करना था।लेकिन समय के साथ कुछ राजा लालची और क्रूर हो गए। वे गरीबों को परेशान करने लगे, उनकी जमीन और धन छीनने लगे।


लोग मदद के लिए रोने लगे। परशुराम ने उनकी पुकार सुनी और तय किया कि उन्हें कुछ करना होगा। उन्होंने कहा, "जो अपनी ताकत का गलत उपयोग करते हैं, उन्हें सबक सिखाना जरूरी है।"


परशुराम ने अपनी कुल्हाड़ी से बुरे राजाओं को हराया और बेकसूर लोगों की मदद की।इससे भगवान शिव, परशुराम से बहुत प्रसन्न हुए।


जब पुजारी ने गाँव के लोगों को साहस, बहादुरी और धर्म के बारे में कहानियाँ सुनाई, तो सभी बहुत खुश हुए।बच्चों ने ताली बजाई और उत्साहित होकर घर लौटे। वे भी भगवान परशुराम की तरह बहादुर, धार्मिक और नैतिक बनना चाहते थे।


तो बच्चों, हमें हमेशा अपनी शक्ति का सही उपयोग करना चाहिए और मुश्किल में फँसे लोगों की मदद करनी चाहिए।भगवान परशुराम की तरह भगवान में विश्वास रखने से हमें हमेशा सही काम करने की प्रेरणा मिलती है।

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श्लोक 


अप्राप्यं नाम नेहास्ति धीरस्य व्यवसायिनः ॥
Aprapyam nama nehasti dhirasya vyavasayinah

स्रोत: कथासरित्सागर


अर्थ:

जिस व्यक्ति के पास मजबूत इरादा और साहस होता है, उसके लिए इस संसार में कोई भी चीज़ असंभव नहीं होती।

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Story type: Motivational

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