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हनुमानजी ने सीना क्यों चीरा?

यह कहानी हमें सिखाती है कि हमें बिना किसी फल की इच्छा के कर्म करना चाहिए।

Keywords: निष्काम कर्म, सेवा, प्रेम

हनुमानजी ने सीना क्यों चीरा

Story



अगले महीने स्कूल में होने वाली स्केटिंग प्रतियोगिता के लिए आर्यन दिन-रात अभ्यास कर रहा था। उसकी कड़ी मेहनत देख कर लग रहा था कि इस बार की प्रतोगिता वही जीतेगा। आर्यन को भी पूरा यकीन था कि वही पहला इनाम जीतेगा, जो कि एक लेटेस्ट प्लेस्टेशन था। आर्यन को बहुत समय से वह चाहिए था। पर प्रतियोगिता में आर्यन को तीसरा स्थान मिला।


आर्यन बहुत दुखी और निराश हुआ। वह स्केटिंग ग्राउंड में बैठा सोच रहा था, “आखिर इतनी मेहनत करने का क्या फायदा अगर मनचाहा इनाम ही ना मिले? अब मैं स्केटिंग कभी नहीं करूँगा।”


उसके मन की बात उसके दोस्त नचिकेता तक पहुँची और वह तुरंत पैराशूट से ग्राउंड में लैंड हुआ और स्केटिंग करते हुए आर्यन के पास आया।


“तुम एक इनाम के लिए स्केटिंग जैसी मज़ेदार चीज़ छोड़ना चाहते हो? चलो तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ, शायद तुम्हारा मन बदल जाए,” नचिकेता ने कहा।


यह तो तुम जानते ही होगे कि श्रीराम ने हनुमानजी की सहायता से लंका के राजा रावण को हराया था। और युद्ध जीतने के बाद वह सीता माता, लक्ष्मण जी, हनुमानजी और अपने दूसरे साथियों के साथ अयोध्या पहुँचे।

जब वह अयोध्या के राजा बने तब सीता माता ने उनसे निवेदन किया कि जिन्होंने भी युद्ध जीतने में उनकी सहायता की है वह उन्हें धन्यवाद के रूप में कुछ भेंट देना चाहती हैं।


सीता माता ने सबको कुछ न कुछ अनमोल भेंट दी। अब हनुमानजी की बारी थी। श्रीराम मुस्कुराते हुए बोले, “आप भला हनुमान को क्या भेंट देंगी? इनकी निस्वार्थ सेवा और भक्ति का तो कोई मोल हो ही नहीं सकता।”


माता सीता ने फिर भी अपनी एक मोतियों की माला, हनुमानजी को भेंट में दी।


हुनमानजी उस माला के एक-एक मोती को दाँतो से तोड़कर देखा और ज़मीन पर फ़ेंक दिया।


सीता माता ने हनुमानजी से पूछा, “आपने ऐसा क्यों किया हनुमान? क्या आपको यह माला पसंद नहीं आई?”


“ऐसी बात नहीं है माता, पर यह भेंट मेरे किसी काम की नहीं, क्योंकि इसमें मुझे मेरे प्रभु राम नहीं दिखे।


अगर मोतियों में राम नहीं तो इनका मोल मेरे लिए मिट्टी के समान है।“


“तो क्या आपके अंदर राम हैं?” सीता माता ने पूछा। सीता माता के ऐसा कहते ही हनुमानजी ने अपना सीना चीर कर सबको अपने हृदय में बसे राम-सीता की छवि के दर्शन कराए।


तो आर्यन, जैसे हनुमानजी ने श्रीराम का कार्य किसी उपहार के लालच में नहीं किया बल्कि इसलिए किया क्योंकि श्रीराम की सेवा करके उन्हें आनंद मिलता था। वैसे ही तुम भी स्केटिंग किसी इनाम के लालच में मत करो बल्कि इसलिए करो क्योंकि तुम्हें उसमें मज़ा आता है। आर्यन को अखिरकार नचिकेता की बात समझ में आ गई।

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स्रोत: भगवद् गीता

भगवद् गीता में कृष्ण ने कहा है:


कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वा आत्मा शुद्धये


कर्मयोगी, फल की इच्छा किए बिना कर्म करने का आनंद लेते हैं।

हमें कोई भी काम किसी फल के लालच में नहीं बल्कि आनंद पाने के लिए करना चाहिए

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Story type: Mythological, Magical

Age: 7+years; Class: 3+

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