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ज्ञानी वाहक और अभिमानी राजा

यह कहानी हमें सिखाती है कि विनम्रता और ज्ञान, धन और घमंड से अधिक कीमती हैं।

ज्ञानी वाहक और अभिमानी राजा

कहानी


एक शाम, छोटी रिया अपनी दादी के पास बैठी थी। दोनों बरामदे में बैठकर डूबते सूरज का मज़ा ले रहे थे।


"दादी," रिया ने पूछा, "आप हमेशा कहती हैं कि बुद्धि धन से ज्यादा महत्वपूर्ण है। ऐसा क्यों?"


दादी मुस्कुराई और रिया के सिर पर प्यार से हाथ फेरा। "मैं तुम्हें एक राजा और एक समझदार व्यक्ति की कहानी सुनाती हूँ, जो अमीर तो नहीं था, लेकिन उसने राजा को कुछ अनमोल सिखाया।

यह रैक्वा और राजा जनश्रुति की कहनी है।"


दादी ने कहानी सुनाई:


बहुत समय पहले की बात है, एक दयालु राजा था, जिसका नाम जनश्रुति था। उसे लोगों की मदद करना और दान देना बहुत पसंद था। उसने यात्रियों के लिए विश्राम-गृह बनवाए, भूखों को खाना खिलाया और ज़रूरतमंदों को जरूरी चीजें दीं। उसे अपने दयावन होने पर गर्व था और वह सोचता था कि उससे ज़्यादा उदार और समझदार कोई नहीं हो सकता। धीरे-धीरे उसे अपने धन का घमंड हो गया।


एक रात, जब राजा अपने महल की छत पर आराम कर रहा था, उसने ऊपर उड़ते हुए दो हंसों की बातें सुनीं। एक हंस ने दूसरे से कहा, "देखो, राजा की अच्छाई दिन की रोशनी की तरह चमक रही है! पास मत उड़ना, वरना जल जाओगे।"


दूसरे हंस ने हँसते हुए कहा, "हाह! तुम किसकी बात कर रहे हो? वह रैक्वा, गाड़ीवाले के सामने कुछ भी नहीं है।"


"रैक्वा कौन है, दादी?" रिया ने पूछा।



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दादी मुस्कुराईं और बोलीं, "राजा ने भी यही सवाल किया था।"


हंसों की बात सुनकर जनश्रुति चौंक गए। उन्होंने सोचा, "यह रैविका कौन है? एक गाड़ीवाला मुझसे महान कैसे हो सकता है?"


राजा ने अपने सेवकों को रैक्वा को ढूँढने के लिए भेजा। कई जगहों पर खोजने के बाद, सेवकों ने रैक्वा को उसकी गाड़ी के नीचे बैठे हुए पाया। वह अपना हाथ खुजा रहा था और बिल्कुल साधारण व्यक्ति लग रहा था। हालाँकि,सेवकों ने राजा को उसके बारे में खबर दी।


अगले दिन, जनश्रुति रैक्वा के पास कई सारे उपहार लेकर गए—गायें, सोने का हार, और एक चमचमाता रथ। राजा ने झुककर कहा, "रैक्वा, मैंने सुना है कि आप ज्ञानी हैं। कृपया मुझे भी ज्ञान दीजिए।"


रैक्वा ने राजा को देखा और कहा, "बुद्धि महँगे उपहारों से नहीं खरीदी जा सकती।"


राजा दुखी होकर लौट आए, लेकिन वह सच्चा ज्ञान पाने के लिए दृढ़ थे। वह और भी अधिक उपहार और अनमोल चीजें लेकर रैक्वा के पास वापस गए।



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"कृपया मुझे वह सिखाइए, जो आप जानते हैं" राजा ने रैक्वा से विनती की।


इस बार, रैक्वा मान गए और बोले, "मैं तुम्हें तुम्हारे उपहारों की वजह से नहीं सिखा रहा हूँ, बल्कि इसलिए कि अब तुम विनम्र हो गए हो और सच में सीखना चाहते हो। अब ध्यान से सुनो।"


रैक्वा ने समझाया, "इस दुनिया में सब कुछ—आग, सूरज, चाँद, पानी—सब हवा में लौट आते हैं। और तुम्हारे अंदर, जब तुम सोते हो, तो तुम्हारी इंद्रियाँ—तुम्हारी वाणी, द्रिष्टि और सुनने की शक्ति—तुम्हारी श्वास, यानी प्राण में लौट आती हैं। जैसे बाहर हवा एक महान शक्ति है, वैसे ही अंदर प्राण एक महान शक्ति है। अगर तुम इसे समझ लो, तो तुम्हें पता चलेगा कि हर चीज़ या प्रक्रिया के पीछे एक अनदेखी शक्ति होती है, जो सब कुछ नियंत्रित और जोड़कर रखती है।"


उस दिन से, जनश्रुति एक दयालु और विनम्र होने के साथ-साथ ज्ञानी भी बन गए।


दादी ने रिया की तरफ़ देखा और बोलीं, "देखा, बेटा, ज्ञान और विनम्रता, धन से ज़्यादा कीमती हैं। राजा ने सीखा कि जो व्यक्ति विनम्र और समझदार होता है, उसे सभी सम्मान देते हैं। एक साधारण व्यक्ति भी हमें कुछ जरूरी बातें सिखा सकता है, अगर हम सुनने को तैयार हों।"


रिया ने तुरंत पूछा, "दादी, रैविका ने ऐसा क्यों कहा कि अंदर और बाहर सब कुछ जुड़ा हुआ है?"


दादी मुस्कुराईं और बोलीं, "आग, सूरज, चाँद और पानी के लिए 'हवा' उनका घर है। जब आग बुझती है, तो वह हवा में मिल जाती है। जब सूरज डूबता है या चाँद छिपता है, तो वे भी हवा में लौट जाते हैं। यहाँ तक कि पानी, जब सूखता है, तो वह भी हवा का हिस्सा बन जाता है। हवा सबको अपने अंदर समा लेने वाली एक बड़ी शक्ति है।


"इसी तरह, जब तुम सोती हो, तो तुम्हारी इंद्रियाँ—जैसे बोलने, देखने और सुनने की शक्ति—आराम करने चली जाती हैं। वे तुम्हारी श्वास यानि प्राण में लौट जाती हैं। प्राण तुम्हारे अंदर की हवा की तरह है—यह तुम्हारे शरीर की बॉस है।"


रिया ने सिर झुकाकर पूछा, "तो प्राण मेरे अंदर की हवा की तरह है, जो मेरे शरीर को ठीक से चलाती है?"


"बिल्कुल सही," दादी ने कहा। "जैसे बाहर की हवा दुनिया की हर चीज़ को जोड़ती है, वैसे ही तुम्हारे प्राण तुम्हारे अंदर सब कुछ जोड़कर रखता है। जब हम यह समझ लेते है तब हम अंदर और बाहर की दुनिया को एक बड़े परिवार की तरह जुड़ा हुआ देख सकते हैं।"


रिया की आँखें चमक उठीं। "वाह, दादी! तो बाहर की हवा और अंदर की साँस दोनों ही बहुत जरूरी हैं!"


दादी ने सिर हिलाया। "हाँ, मेरी बच्ची," और फिर वे दोनों अंदर चले गए क्योंकि अंधेरा हो रहा था।


नोट: कहानी में उल्लेखित हवा और प्राण का अर्थ उस परम सत्य या ब्रह्म से है, जो हर चीज़ के अस्तित्व के पीछे का सत्य है—चाहे वह जीवित हो या निर्जीव।

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श्लोक:


न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति।।

Na hi gyanena sadrisham pavitram iha vidyate,
Tat svayam yoga-samsiddhah kalena atmani vindati.


स्रोत: भगवद्गीता (अध्याय 4, श्लोक 38)


अर्थ:
इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र और कुछ भी नहीं है। जो योग (आध्यात्मिक साधना) में सिद्धि प्राप्त करता है, वह समय के साथ यह ज्ञान अपने भीतर ही प्राप्त कर लेता है।

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Story type: Motivational

Age: 7+years; Class: 3+

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