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आत्मा का पूरा सच क्या है?
किसी चीज़ का सच को जानने के लिए उसे पूरी तरह जानना ज़रूरी है ।

कहानी बहुत समय पहले पाँच महान ऋषि थे – प् रचीनशिला, सत्ययज्ञ, इन्द्रद्युम्न, जन और बुडिल। ये सब वेदों के बड़े विद्वान थे। एक दिन वे आपस में चर्चा करने लगे – “आत्मा कौन है? और ब्रह्म क्या है?”
काफी देर तक बात करने के बाद भी वे किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सके। तब उन्होंने सोचा कि चलो ऋषि उद्दालक से पूछते हैं। उन्हें आत्मा और ब्रह्म का गहरा ज्ञान है।
ऋषियों ने उद्दालक से विनती की कि वे उन्हें यह सच बताएँ। परन्तु उद्दालक बहुत विनम्र थे। उन्होंने कहा – “इस सच को सबसे अच्छे रूप में राजा अश्वपति जानते हैं। आप सब उनसे जाकर यह ज्ञान प्राप्त कीजिए।”
सब ऋषि राजा अश्वपति के महल पहुँचे। राजा ने उनका सत्कार किया और कहा कि वह उन्हें धन देंगे। पर ऋषियों ने कहा – “हमें धन नहीं चाहिए, हमें आत्मा और ब्रह्म का सच जानना है।”
अगले दिन सभी ऋषि शिष्य बनकर राजा अश्वपति के पास पहुँचे। राजा ने उनसे पूछा कि आप किसका ध्यान करते हैं। किसी ने कहा – “मैं आकाश को आत्मा मानकर ध्यान करता हूँ।” किसी ने कहा – “मैं जल को आत्मा मानता हूँ।” कोई वायु को, कोई सूर्य को, कोई धरती को आत्मा मानता था।

तब राजा अश्वपति ने समझाया, “आप सब अपने-अपने ध्यान में सही हैं, लेकिन आप केवल शरीर का एक-एक अंग देख रहे हैं पूरे मनुष्य को नहीं। अश्वपति ने आगे समझाय , जैसे मनुष्य का शरीर है— दिमाग से हम सोचते हैं, आँखों से देखते हैं, प्राण (साँस) से जीते हैं और पाँव से चलते हैं।
अगर कोई केवल आँखों को ही ‘पूरा मनुष्य’ मान ले, तो क्या वह सच जान पाएगा? नहीं। अगर कोई केवल पाँव को ही ‘पूरा मनुष्य’ कहे, तो भी वह अधूरा होगा। असली सच का पता तो तब चलेगा जब हम शरीर के सारे अंगों को मिलाकर ‘पूरे मनुष्य’ को देखेंगे।”
राजा ने आगे कहा, “वैसे ही आपमें से किसी ने आकाश, किसी ने जल, किसी ने वायु, किसी ने सूर्य और किसी ने धरती को आत्मा माना है। ये सब सही हैं, पर अधूरे हैं। आत्मा का सच जानने के लिए इन्हें अलग-अलग नहीं बल्कि एक साथ देखना होगा।”
पाँचों ऋषियों को समझ आया कि सच को जानने के लिए उसके किसी एक भाग पर नहीं, बल्कि पूरे सच पर ध्यान देना चाहिए। जिस प्रकार शरीर के सभी अंग मिलकर मनुष्य बनते हैं, वैसे ही आकाश, जल, वायु, सूर्य, धरती और सब कुछ मिलकर ही आत्मा का पूरा सच दिखाते हैं।
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श्लोक
प्रधानं क्षरं हरः अमृताक्षरम्।
एकः देवः क्षरात्मानौ ईशते॥
तस्य अभिध्यानात् योजनात्
तत्वभावात् भूयः अन्ते विश्वमायानिवृत्तिः च॥
स्त्रोत : श्वेताश्वतर उपनिषद्
अर्थ
दुनिया की चीज़ें जैसे पेड़, पहाड़ और हमारा शरीर बदलते हैं और खत्म हो जाते हैं। लेकिन हमारी आत्मा कभी खत्म नहीं होती।
सबको चलाने वाले एक परमेश्वर हैं। अगर हम उन्हें याद करें और उनसे जुड़ें, तो हमें सही ज्ञान और शांति मिलती है।
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Story type: Motivational
Age: 7+years; Class: 3+






















