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हमारी छुपी हुई शक्ति का सच
संसार की हर चीज़ के पीछे का सच, ब्रह्म या भगवान ही है।

कहानी
एक शाम, एक गुरुकुल में प्रार्थना समाप्त होने के बाद सारे शिष्य अपने गुरु के चारों ओर बैठ गए। बच्चे एक-एक करके अपने गुरु से सवाल पूछने लगे।
एक जिज्ञासु बालक ने पूछा, “गुरुदेव, मुझे सोचने और बोलने की शक्ति कौन देता है? मेरे शरीर में प्राण कौन भरता है? मुझे देखने और सुनने की शक्ति कौन देता है?यह कौन-सी छिपी हुई शक्ति है?”
ऋषि मुस्कुराए और बोले, “प्यारे बच्चों, यह सभी काम एक ही शक्ति के कारण होते हैं। वही शक्ति हमारा सच है। उसी शक्ति के कारण हमारी ऑंखें देखती हैं, कान सुनते हैं और मन सोचता है। हमारी आँखें उसे नहीं देख सकतीं, हमारी जीभ उसके बारे में कुछ नहीं बोल सकती। पर वही हमें देखने, बोलने और सोचने की शक्ति देती है।
यह शक्ति ब्रह्म या भगवान ही है। और याद रखो, तुम ब्रह्म से अलग नहीं हो। जो इसे जान लेता है, उसे सच्ची खुशी और आनंद मिलता है।”
कुछ बच्चों को अभी भी बात पूरी तरह समझ में नहीं आई। तब ऋषि ने उन्हें एक बड़ी ही रोचक कहानी सुनाई।
“बहुत समय पहले देवताओं और दानवों में युद्ध हुआ। देवताओं ने युद्ध जीत लिया। देवताओं को अपनी जीत का बहुत घमण्ड हो गया। वह ज़ोरों से घोषणा करने लगे,“ हमने दानवों को हरा दिया! देवताओं की विजय हुई!”

पर असल में जीत उन्हें ब्रह्म की शक्ति से मिली थी।
ब्रह्म ने सोचा – “इन्हें सच बताना चाहिए।” वे देवताओं के सामने एक विशेष रूप में प्रकट हुए। देवता समझ ही नहीं पाए कि यह कौन है।
सबसे पहले अग्निदेव ब्रह्म के पास गए।ब्रह्म ने उनसे पूछा – “तुम कौन हो?”अग्निदेव ने गर्व से कहा – “मैं अग्नि हूँ, मैं सबकुछ जला सकता हूँ।”

ब्रह्म ने उनके सामने एक तिनका रख दिया और कहा – “इसे जला कर दिखाओ।”
अग्निदेव ने पूरी शक्ति लगा दी, पर तिनका नहीं जला। वह हारकर लौट आए।
फिर वायु देव गए। उन्होंने कहा – “मैं वायु हूँ, सबको उड़ा सकता हूँ।”
ब्रह्म ने वही तिनका रखा और कहा –“इसे उड़ाकर दिखाओ।”
वायु ने पूरी ताकत से फूँक मारी, पर तिनका हिला भी नहीं। वायु देव भी लौट आए।

अन्त में इन्द्र देव गए। पर जैसे ही वे पहुँचे, ब्रह्म वहाँ से गायब हो गए और वहाँ एक देवी प्रकट हुईं। वह थीं देवी उमा, हिमालय की पुत्री।
इन्द्र ने पूछा –“वह कौन थे?”
देवी उमा बोलीं –“वह स्वयं ब्रह्म थे, इस संसार में होने वाली हर चीज़ के पीछे का सच। तुम्हें विजय उसी शक्ति से मिली है, न कि तुम्हारी अपनी ताकत से।”
देवताओं को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने मन ही मन ब्रह्म को प्रणाम किया।
कहानी सुनाकर गुरु ने बच्चों से कहा, “बच्चों, ब्रह्म वही चमक हैं जो हमारी आँखों की रोशनी में चमकते हैं। मन की सोच और संकल्प भी उन्हीं की शक्ति से होते हैं।
जब हम अपने मन पर काबू रखते हैं, सबकी सेवा करते हैं और ध्यान लगाते हैं, तब हम ब्रह्म को मेहसूस कर पाते हैं। जो ब्रह्म को जान लेता है, वह सदा सुखी रहता है।”
बच्चे खुश हो गए। वे अपने-अपने कक्ष में लौटे और आनंद के साथ इस सीख पर विचार करने लगे।
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श्लोक
यत् प्राणेन न प्राणिति। येन प्राणः प्रणीयते। तत् एव त्वं ब्रह्म विद्धि। यत् इदं उपासते इदं न॥
स्त्रोत : केनोपनिषद्
अर्थ
जो हमें साँस लेने की शक्ति देता है, पर खुद हमारी तरह साँस नहीं लेता – वही भगवान है। वही प्राणवायु (हवा) को चलाता है। वही ब्रह्म है।
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Story type: Motivational
Age: 7+years; Class: 3+






















