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कृष्ण और अर्जुन की सच्ची दोस्ती

यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची दोस्ती का मतलब है विश्वास, समझ और आपसी सहयोग है।

Krishna and Arjuna: Friends Forever

कहानी


वासु और राजा कक्षा में साथ बैठते थे। उन्हें सबसे अच्छा दोस्त माना जाता था। लेकिन कभी-कभी उनकी दोस्ती इतनी अच्छी नहीं रहती थी और उनके बीच भी छोटे-मोटे झगड़े भी हो जाया करते थे। कभी वे यह तय करने पर झगड़ते थे कि कौन-सा कार्टून देखना है, तो कभी उनकी किसी खेल को लेकर लड़ाई हो जाती, और कभी-कभी चॉकलेट के आखिरी टुकड़े को लेकर, उन दोनों में बहस हो जाती। वे एक-दूसरे की परवाह करते थे, लेकिन अपनी लड़ाइयों की वजह से उन्हें यह संदेह होने लगा कि "क्या वे सच में अच्छे दोस्त हैं!"


आज कक्षा में, वासु और राजा के बीच हिन्दी के नोट्स को लेकर सभी साथियों के सामने बड़ी लड़ाई हो गई।

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उनकी नैतिक शिक्षा की टीचर, मिनाक्षी मैम, क्लासरूम में आईं। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “आज हम एक बहुत खास विषय पर बात करेंगे—दोस्ती।”


वासु और राजा ने एक-दूसरे की तरफ देखा। वे उत्साहित थे, लेकिन यह सोचकर थोड़ा चिंतित भी थे कि मैम सच्ची दोस्ती के बारे में क्या कहेंगी।


मिनाक्षी मैम ने उनकी चिंता देखी और बोलीं, “मैं तुम्हें कृष्ण और अर्जुन की कहानी सुनाती हूँ, दो ऐसे दोस्त जिनका रिश्ता हमें दोस्ती का असली मतलब सिखाता है।”


कृष्ण और अर्जुन की कहानी


“अर्जुन एक महान योद्धा था, बहादुर और निपुण,” मैम ने शुरू किया। “और कृष्ण बुद्धिमान, दयालु और प्रेम से भरे हुए थे। कृष्ण और अर्जुन चचेरे भाई थे, लेकिन उससे भी ज्यादा, वे सबसे अच्छे दोस्त थे।”


“जैसे हम!” राजा ने धीरे से वासु से कहा।


मैम मुस्कुराईं और आगे बोलीं, “एक दिन बड़ी लड़ाई होने वाली थी, कुरुक्षेत्र की लड़ाई। अर्जुन, जो एक पांडव थे, और दुर्योधन, कौरवों का नेता, कृष्ण की मदद चाहते थे। कृष्ण ने उन्हें एक विकल्प दिया: एक को उनकी शक्तिशाली सेना मिल सकती थी, और दूसरे को कृष्ण खुद दोस्त और मार्गदर्शक के रूप में मिल सकते थे, लेकिन कृष्ण लड़ाई में हिस्सा नहीं लेंगे।”


“अर्जुन ने क्या चुना?”, राजा ने आँखें बड़ी करके पूछा।


मैम ने कहा “अर्जुन ने कृष्ण को चुना। उसने कहा, ‘मुझे सेना की ज़रूरत नहीं है। हे कृष्ण! तुम्हारे जैसे दोस्त, मेरे लिए बहुत हैं।”


वासु, ने कहानी में दिलचस्पी दिखाते हुए पूछा। “लेकिन युद्ध के दौरान क्या हुआ?”


मैम ने आगे बताया, “युद्ध के मैदान में, अर्जुन को एक कठिन स्थिति का सामना करना पड़ा। उन्होंने देखा कि उनके परिवार वाले और दोस्त, जो बुराई के पक्ष में थे, सामने खड़े हैं और लड़ने को तैयार थे। अर्जुन उन्हें चोट नहीं पहुँचाना चाहते थे और उन्होंने तय किया कि वह लड़ाई नहीं करेंगे।”


“फिर कृष्ण ने क्या किया?” राजा ने उत्सुक होकर पूछा।


“कृष्ण, ने एक सच्चे दोस्त और सारथी की तरह अर्जुन की मदद की। उन्होंने अर्जुन को समझाया कि कभी-कभी सही काम करना बहुत कठिन होता है, लेकिन अपने कर्तव्य का पालन करना और सही के लिए खड़ा होना बहुत ज़रूरी है। उन्होंने ये भी बताया कि सच्ची ताकत सूझ-बूझ से सही काम करने में होती है, सिर्फ जीतने या हारने में नहीं।”


“जब कुरुक्षेत्र का युद्ध शुरू हुआ, तो अर्जुन बड़ी परेशानी में थे। कर्ण का शक्तिशाली अस्त्र अर्जुन को हरा सकता था, लेकिन कृष्ण ने रथ को ज़मीन में दबाकर अर्जुन को बचा लिया। वह बाण अर्जुन के सिर से चूक गया और केवल उनके मुकुट को लगा ।”


“तो अर्जुन ने कृष्ण की सलाह से हिम्मत पाई और लड़ाई की,” मैम ने कहा। “और साथ में, उन्होंने दिखाया कि सच्ची दोस्ती विश्वास, सहयोग और हमेशा एक-दूसरे को सही काम में मदद करने में होती है।”


वासु ने मैम से पूछा, “मैम, अगर दोस्त कभी-कभी झगड़ें तो क्या होगा?”


“कोई बात नहीं, वासु,” मैम ने जवाब दिया। “कभी-कभी सबसे अच्छे दोस्तों में भी छोटी-मोटी लड़ाइयाँ हो सकती हैं। लेकिन सच्चे दोस्त हमेशा एक-दूसरे को माफ़ कर देते हैं, एक-दूसरे की मदद करते हैं और छोटी-छोटी बातों की वजह से अपनी दोस्ती को तोड़ने नहीं देते।”



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उस दिन के बाद से, वासु और राजा अच्छे दोस्त बनने की कोशिश करने लगे। वे कभी-कभी झगड़ते तो थे, लेकिन वे हमेशा कृष्ण और अर्जुन की कहानी को याद रखते थे।

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श्लोक:


यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥

Yatra Yogeshwarah Krishno Yatra Partho Dhanurdharah,
Tatra Shrirvijayo Bhutirdhruva Neetirmatirmama.


स्रोत: भगवद गीता, अध्याय 18, श्लोक 78


अर्थ:
जहाँ योग के स्वामी कृष्ण और धनुषधारी अर्जुन होंगे, वहाँ निश्चित रूप से महिमा, विजय, अद्भुत शक्ति और धर्म होगा।

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Story type: Motivational

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