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घंटाकर्ण शिव भक्त की कहानी
यह कहानी हमें सिखाती है कि सभी भगवान एक ही भगवान के अलग-अ लग रूप हैं और हमें सभी का सम्मान करना चाहिए।

कहानी
बहुत समय पहले एक बड़ा शिव-भक्त था। वह हररोज़ बड़े मन से शिवजी की पूजा करता। लेकिन उसे वो लोग बिलकुल पसंद नहीं थे जो भगवान विष्णु की पूजा करते थे। उसे लगता था कि शिव ही सच्चे भगवान हैं और उसे विष्णु भगवान का नाम सुनना भी पसंद नहीं था।
भगवान विष्णु का नाम न सुनने के लिए उसने कुछ अजीब किया। उसने अपने कानों में छोटी-छोटी घंटियाँ बाँध लीं। जब भी कोई ‘भगवान विष्णु’ का नाम लेता, वह सिर हिलाकर घंटियाँ बजा देता ताकि उसे वो नाम सुनाई न दे।
एक रात, भगवान शिव उसके सपने में आए और बोले, ‘मूर्ख! मैं ही विष्णु हूँ और मैं ही शिव हूँ। हम दोनों एक ही हैं, बस हमारे नाम और रूप अलग हैं।’
लेकिन वह आदमी बोला, “मुझे किसी और भगवान पर विश्वास नहीं है। आप ही मेरे भगवान हैं।”
अगली सुबह जब वह शिव की पूजा कर रहा था, तो धूप की खुशबू ऊपर उठी और उसने देखा कि शिवजी की मूर्ति का आधा हिस्सा भगवान शिव जैसा था और आधा हिस्सा भगवान विष्णु जैसा!
वह चौंक गया। उसने जल्दी से विष्णु वाले हिस्से की नाक ढक दी ताकि धूप की खुशबू वहाँ तक न पहुँच पाए।
भगवान शिव दुखी होकर बोले, “तुम मुझे नहीं, अपने अहंकार को प्यार करते हो। जब त ुम दूसरों से नफरत करते हो, तब तुम सच्चे प्रेम को भूल जाते हो।”
अपने अहंकार के कारण वह आदमी एक राक्षस बन गया — राक्षस घंटाकर्ण। घंटाकर्ण उन लोगों का प्रतीक था जो अपने तरीकों और पसंद को ही सबसे सही मानते हैं और दूसरों की पसंद छोटा समझते हैं।”
सभी भगवान एक ही भगवान के अलग-अलग रूप हैं और हमें सभी का सम्मान करना चाहिए।
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विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥
Vidyavinayasampanne brahmane gavi hastini
shuni chaiva shvapake cha panditah samadarshinah
एक बुद्धिमान व्यक्ति सबको समान दृष्टि से देखता है और सभी जीवों का सम्मान करता है।
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Story Type: Motivational
Age: 7+years; Class: 3+






















