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नचिकेता के साथ खेल-खेल में

यह कहानी हमें सिखाती है कि हम वास्तव में कौन हैं।

Keywords: आत्मज्ञान, चित्, आत्मविश्वास

नचिकेता के साथ खेल-खेल में

Story


आज जब निखिल स्कूल से घर आया, तो वह बहुत उदास था। जब माँ ने उससे वजह पूछी तो उसने बात टाल दी और चुपचाप अपने कमरे में चला गया। वह बहुत देर तक अपने कमरे में बैठा कुछ सोच रहा था। निखिल उदास है यह बात उसके दोस्त नचिकेता ने अपनी जादुई शक्ति से जान ली। नचिकेता फ्लैशबैक में जाकर देखता है कि आखिर स्कूल में हुआ क्या था। उसने देखा कि कुछ शरारती बच्चे, निखिल के छोटे कद और मोटे शरीर का मज़ाक उड़ा रहे थे। नचिकेता प्रेजेंट में आकर निखिल से मिलने गया। तेज़ बारिश हो रही थी इसलिए नचिकेता रेनकोट पहने अपने छाते से उड़कर निखिल के घर पहुँचा।


“अच्छा हुआ नचिकेता जो तुम आ गए, मैं अकेले बहुत बोर हो रहा था,” निखिल बोला।


“मुझे पता है, इसलिए मैं तुम्हारे साथ खेलने आ गया,” नचिकेता ने कहा।


“तो हम क्या खेलें, कैरम, चैस, वीडियो गेम या कुछ और?” निखिल ने नचिकेता से पूछा।


“आज हम कुछ नया खेलेंगे, इस खेल का नाम है ‘तुम कौन हो?’”,नचिकेता ने कहा।


“ये भला कैसा खेल है? मैं जानता हूँ मैं कौन हूँ, मैं निखिल हूँ। “


“आज तुम जानोगे कि तुम इसके अलावा क्या हो! वो भी मज़ेदार खेल से, तो चलो शरू करते हैं। “


“निखिल तुम कौन हो?” नचिकेता ने खेल शुरू करते हुए कहा।


“मैं अपने हाथ हूँ, जिनसे मैं अपने सारे काम करता हूँ,” निखिल ने कहा।


नचिकेता ने एक कपड़े से निखिल के हाथ बाँध दिए।


“अब तुम अपने हाथों का इस्तेमाल नहीं कर सकते। अब तुम कौन हो?”


“हाँ, मैं अपने पैर हूँ, जिनसे मैं कहीं भी आ-जा सकता हूँ,” निखिल बोला।


नचिकेता ने निखिल के पैर भी बाँध दिए। “अब बताओ निखिल, अब तो तुम कहीं आ-जा भी नहीं सकते। अब तुम कौन हो?”


“हाँ, मैं अपनी आँखें हूँ, जिनसे मैं यह सारी दुनिया देख सकता हूँ,” निखिल ने कहा।


नचिकेता ने निखिल के आँखों पर पट्टी बाँध दी, और उससे फिर वही सवाल पूछा।

जिसके जवाब में निखिल ने कहा, “मैं अपनी बुद्धि हूँ, जिससे मैं सब समझता हूँ, और कठिन सवालों के जवाब दे पाता हूँ।”


नचिकेता ने जादू से, निखिल के सोचने समझने की शक्ति कम कर दी। और एक बार फिर उससे पूछा, “अब बताओ क्या तुम हो?”


“हाँ, कमाल है, मुझे अभी भी लगता है कि मैं हूँ। पर ऐसा कैसे हो सकता है?” निखिल ने कहा।


“क्योंकि तुम अपना नाम, शरीर और बुद्धि नहीं हो, तुम इससे बढ़कर अपने होने का एहसास हो। तुम वो शक्ति हो जिससे तुम ये जान सकते हो कि तुम हो,” नचिकेता ने कहा।


निखिल, नचिकेता की बात पूरी तरह तो नहीं समझ पाया, पर वो इतना जान गया कि वो क्या नहीं है।


“अब मैं उन बच्चों की बात का बुरा नहीं मानूंगा, जो मेरे शरीर का मज़ाक उड़ाते हैं, धन्यवाद नचिकेता।


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स्रोतः निर्वाण षट्कम


मनो बुद्धि अहंकार चित्तानि नाहं

चिदानंद रूपः शिवोहम शिवोहम


मैं मन, बुद्धि, अहंकार और स्मृति नहीं हूँ

मैं चैतन्य रूप हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ

हमें अपने शरीर की बनावट या रूप-रंग पर बहुत ज़्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए क्योंकि हम इस शरीर से बढ़कर हैं।


निर्वाण षट्कम के इस श्लोक में आदि शंकराचार्य कहते हैं कि हम अपने शरीर और मन से बढ़कर आनंदरूप शिव के समान हैं।

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Story type: Adventure, Motivational

Age: 7+years; Class: 3+

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