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लक्ष्मण और परशुराम का आमना-सामना

myNachiketa
Apr 30
4 min read

सीताजी के स्वयंवर के समय राजा जनक के महल में एक रोचक घटना हुई। वहाँ भगवान शिव का एक विशाल और शक्तिशाली धनुष रखा गया था, और जो उसे उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ा देता, वही सीताजी से विवाह करता। जब श्री राम ने उस धनुष को उठाने की कोशिश की, तो वह दो टुकड़ों में टूट गया! यह देखकर सभी हैरान रह गए।

उसी समय शक्तिशाली ऋषि परशुराम वहाँ पहुँचे, वे भगवान शिव के बड़े भक्त। टूटे हुए धनुष को देखकर वे बहुत क्रोधित हुए। वे जानना चाहते थे कि यह किसने किया। राम शांत रहे, लेकिन लक्ष्मण उत्तेजित हो गए। तभी लक्ष्मण और परशुराम के बीच एक तीखी और रोचक बातचीत शुरू हुई।

परशुराम (क्रोध में, राम की ओर देखते हुए): “किसने भगवान शिव के महान धनुष को तोड़ने का साहस किया? क्या तुम उसकी शक्ति को समझते भी हो? यह कोई साधारण धनुष नहीं है!”

लक्ष्मण (मुस्कुराते हुए, मज़ाकिया अंदाज़ में): “कृपया सुनिए। बचपन में हमने कई धनुष तोड़े हैं। हमें लगा यह भी एक पुराना धनुष है। आखिर आपको इससे इतना लगाव क्यों?”

परशुराम (और अधिक क्रोधित होकर): “मूर्ख बालक! अपने शब्दों पर ध्यान दो। क्या तुम्हें यह एक साधारण धनुष लगता है? यह भगवान शिव का धनुष है, जो पूरे संसार में प्रसिद्ध है!”

लक्ष्मण (साहस के साथ): “हमारे लिए सभी धनुष एक जैसे ही होते हैं। और यह तो इतना पुराना था कि मेरे भाई श्री राम के छूते ही टूट गया। इसमें उनकी क्या गलती है? आप बिना कारण क्रोधित क्यों हो रहे हैं?”

परशुराम (धमकी देते हुए): “अहंकारी बालक! यह मत समझो कि मैं तुम्हें इसलिए छोड़ रहा हूँ क्योंकि तुम छोटे हो। क्या तुम जानते हो मैं कौन हूँ? मैं परशुराम हूँ—क्षत्रियों का नाश करने वाला! मेरा क्रोध पूरे संसार में प्रसिद्ध है!”

परशुराम (गुस्से में): “अरे बालक! क्या तुम मेरी धारीदार कुल्हाड़ी देख रहे हो? मैं बहुत शक्तिशाली हूँ! मैंने कई राजाओं को हराया है। बड़े-बड़े वीर मुझे देखकर डर जाते हैं। मुझे क्रोधित मत करो, नहीं तो तुम बड़ी मुसीबत में पड़ जाओगे!”

लक्ष्मण (मुस्कुराते हुए, मजाक में): “अच्छा! आप खुद को बहुत महान समझते हैं, है न? आप बार-बार अपनी कुल्हाड़ी दिखा रहे हैं, जैसे थोड़ी सी फूँक से पहाड़ हिलाने की कोशिश कर रहे हों!”

“लेकिन मैं ऐसा नहीं हूँ जो आसानी से डर जाए। मैंने सिर्फ इसलिए बात की क्योंकि आप यहाँ इतने क्रोध में आए। हमारे कुल में हम ऋषियों और बड़ों का सम्मान करते हैं। इसलिए आप क्रोधित हों, तब भी मैं आपसे विनम्रता से ही बात करूँगा।”

लक्ष्मण (हल्की हँसी के साथ): “और आप इतने भारी हथियार क्यों लिए हुए हैं? आपकी ऊँची आवाज ही सबको डराने के लिए काफ़ी है! इतने क्रोध में तो आपको उस कुल्हाड़ी की भी जरूरत नहीं है!”

परशुराम (बहुत क्रोधित होकर): “सब सुनो! यह बालक बहुत शरारती है! यह खुद के लिए मुसीबत बुला रहा है। अगर मैं इसे दंड दूँ तो मुझे दोष मत देना! कोई इसे बताए कि मैं कौन हूँ, ताकि यह चुप रहना सीखे!”

लक्ष्मण (चंचल मुस्कान के साथ): “हे ऋषि, दूसरों से क्यों पूछते हैं? आप तो अपनी महानता के बारे में हमें कई बार बता चुके हैं! आपकी प्रशंसा आपसे अच्छी कोई नहीं कर सकता!”

लक्ष्मण ऋषि को छेड़ते हैं


लक्ष्मण मुस्कुराए और बोले, “कृपया शांत हो जाइए। क्रोध अच्छा नहीं होता। यह लोगों से गलत काम कराता है। क्या आप सच में एक टूटे हुए धनुष के लिए इतने दुखी हैं? अगर आप उससे इतना प्रेम करते हैं, तो हम उसे ठीक करवा सकते हैं! इतना क्रोधित क्यों होना?”

राजा जनक (चिंतित होकर): “लक्ष्मण, कृपया चुप हो जाओ। किसी महान ऋषि से इस तरह बात करना ठीक नहीं है।”

परशुराम बहुत क्रोधित हो जाते हैं

परशुराम ने अपनी कुल्हाड़ी उठाई और चिल्लाए: “इस बालक ने सारी सीमाएँ पार कर दी हैं! मैंने इसे छोटा समझकर माफ करना चाहा, लेकिन अब मैं इसे और सहन नहीं कर सकता!”

लक्ष्मण निडर रहते हैं

लक्ष्मण ने साहस से उत्तर दिया: “आप कहते हैं कि आप महान योद्धा हैं। लेकिन सच्चे वीर कठोर वचन नहीं बोलते। वे अपने कार्यों से अपनी शक्ति दिखाते हैं, शब्दों से नहीं। जिसे खुद पर भरोसा नहीं होता, वही बार-बार अपनी प्रशंसा करता है।”

श्री राम बीच में आते हैं

श्री राम धीरे से आगे आए और बहुत विनम्रता से बोले: “कृपया इसे क्षमा करें। ये छोटा और इसे उतनी समझ नहीं है। आप बुद्धिमान और दयालु हैं। कृपया इसके शब्दों से क्रोधित न हों।”

फिर परशुराम ने अपना धनुष श्री राम को दिया और उनसे अपनी शक्ति दिखाने को कहा। श्री राम ने उसे आसानी से उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ा दी।


यह देखकर परशुराम समझ गए कि श्री राम कोई साधारण व्यक्ति नहीं हैं; वे स्वयं भगवान विष्णु हैं। तुरंत उनका क्रोध शांत हो गया। उन्होंने हाथ जोड़कर क्षमा मांगी और श्री राम की स्तुति की। फिर वे शांति से चले गए, और सभी लोग फिर से प्रसन्न हो गए।

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kean
Sep 26

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Rose
Aug 18
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